Vichar Munch

Category - Poem

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कहीं दूर न हो जाए कोई अपना

कहीं दूर न हो जाए कोई अपना

कब खत्म होगा शिकायत का सिलसिला  कहीं दूर न हो जाए हमसे कोई अपना । वक्त की आदत है ना ठहरने की  बिन माँगे गमों के संयम में डूबोने की। क्यों छोटे से सफर में है इतने गिले एक बार खुल कर जीवन तो जी ले। हर सुख है...

माँ

जिस माँ ने नौ महीने पेट में रखकर प्यार दिया , दुलार दिया , “तुम भूल गए”, जिस पिता ने हाथ थाम कर खुद गिर कर तुमको चलना सिखाया ” तुम भूल गए “, दो – चार दिन के प्यार के लिए तुमने अपने माँ...

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