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मूक

मैं मूक अपनी कथा तुम्हे बतलाती हूँ थोड़े शब्दों में व्यथा अपनी दोहराती हूँ. कहने को मै मूक हूँ मगर असाधारण तो नहीं हूँ ईंसान मै भी असामान्य तो नहीं दर्द मेरे जख़्म मेरे गहरे हैं हर नेतृत्व पर मेरे पहरे हैं.. .. आखिर क्या है अपराध मेरा कि मैं इक मूक हूँ मुझमें बोलने की क्षमता नहीं मैं मनगढंत बातों को सुनने के काबिल नहीं पर इसका ये मतलब तो नहीं. मैं प्यार से वंचित रहूँ मेरा कोई सपना नही मेरी कोई राह नहीं ए _मानुष किस रिति पर तू चलता है हर क्षण तू बदलता है तेरे कानून खत्म क्यों नहीं हो जाते. हूँ ईंसान मै भी मुझे क्यों नहीं अपनाते खुदा की बंदगी से कुछ तो डर. ऐसे परिवर्तन से बेबस न कर तेरे कार्यों तले दब जाऊँ तो मैं पूछी जाऊँ गी उठा दी न्याय की ज़्वाला जो पागल घोषित की जाऊँ गी कहाँ का समाज अपनाया है जहाँ खुदा भी खुद को बेबस पाया है ईच्छाएं मार कर रहती हूँ तो दिल में बसती हूँ खिल कर हंस दिया तो बहोत खटकती हूँ बस गलती इतनी है कि मैं इक मूक हूँ पर ए दरिंदे दिल तू शायद अपनी मूर्खता से अंजान बनता है लगा कर हजार पिंजरे यूँ खुदा की संतान का बहिष्कार करता है रख इंसानियत जिंदा अपनी कभी तो न्याय को जानेगा दर्द कितना सहा है इस बेजुबां ने तू बशर्ते मानेगा खैर नीति ही यही है तेरे रचित समाज की. जो जुबानों की जुंबा काटते आये है वो क्या कद्र करेंगे बेजुबान की_!!!! ©akanksha123

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