Poem

इश्क़,यक़ीन,नाराज़गी और शिकायत!

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इश्क़

आज़ादी से इतर मुझे एक ज़िन्दगी चाहिये थी,मुझे तेरे इश्क़ की ग़ुलामी चाहिए थी!!
प्यार,मोहब्बत और वफ़ा चाहिये थी, मुझे इस ज़िन्दगी में तेरी रहबरी चाहिये थी!!
तुझे कैसे समझाओ की तू क्या है मेरे लिये, मुझे तेरे जिस्म में कैद मेरी रूह चाहिये थी!!
प्यार तो बस एक एहसास है दुनिया के लिये, मुझे तेरे प्यार में खुद की ज़िंदगी फानी चाहिये थी!!
मैंने “इश्क़” नही इबादत की थी तेरी, मुझे “मीरा” वाला नही मुझे “रुक्मणी” वाला “कृष्ण”चाहिये!!
कैसे कर समझाऊ की मैं पंछी हूँ प्यार का, मुझे तेरी क़ैद के पिंजरे में मेरी उम्र चाहिये थी!!
कैसे मैं किसी और का हो जाने का सोच लूं “मेहदी”, मुझे तेरी सोच में जीने-मरने वाली मोहब्बत चाहिये थी!!
आज़ादी से इतर मुझे एक ज़िन्दगी चाहिये थी, मुझे तेरे “इश्क़ की ग़ुलामी” चाहिए थी!!!
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यकीन!!

यकीन ना हो तो फिर दिल की बात आखिर किसी से क्या करना!!
छत जब ना हो मकान की तो बारिश से आखिर इतना क्यों डरना!!
दीवारे ही बोसीदा हो जाए अगर मकान की, तो घर की मरम्मत क्या करना!!
अल्फाज़ो में नरमी न हो तो ए हमनफस, ऐसे रिश्ते का एहतराम क्या करना!!
तुम सही और मैं ग़लत ये सोच है जो अब, ऐसे जवाब पर दिलबर सवाल क्या करना!!
ख्वाबों में भी अब उनसे मुलाकात जो न हो, ऐसी सुकूनपरस्त नींद का क्या करना!!
धड़कन आज भी उसके नाम से बढ़ती है, मगर अब ऐसे मतलबी दिल का क्या करना!!
वो सारे शहर में मुझे मशहूर कर गया है, मगर उस बिन इस महफ़िल के शोर का क्या करना!!
प्यार-वफ़ा सब खूब था हमारे दरमियां कभी, अब जो वो नही ऐसी मोहब्बत का क्या करना!!
मैं समझा दू और तू हर बार तब समझ जाए, ऐसी समझ का जनाब क्या करना!!
उसमें हिस्सा तेरा भी है,बयाँ कर दूं जो मैं कभी, ऐसे दर्द का इश्तियार क्यों कर करना!!
दिलाफ़रोज़ मोहब्बत और वफ़ा भी थी उससे, अब उस “बेउन्स”हमनफस से उम्मीद क्या करना!!
ग़लत तो है और वो पानी सा साफ कहा, ऐसे इश्क़ के दरिया को पार क्या करना!!
तुम “खूब” हो ये समझता हूँ मगर, ऐसे “खूब” का भी अब “दिलफरेब -मेहदी” क्या करना!!
दिलाफ़रोज़- Precious
इश्तियार- Famous
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नाराज़गी

तेरे मेरे ख्वाबो की उड़ान एक तो न थी, तुझसे मोहब्बत तेरी जैसी मुझे तो न थी!!
इश्क़ आबे-रवा था तेरा मेरे लीये बेशुमार,तुझसे उल्फत तेरी जैसी मुझे तो न थी!!
तेरे ख्याल में मैं मुख्तसर तो था ही नही, तुझसे दोस्ती तेरी जैसी मुझे तो न थी!!
मेरे होने पे तुझमे कोई शुबहा ही नही था, तुझसे अदावत तेरी जैसी मुझे तो न थी!!
ये माना कि तेरी खुशी के जश्न में मैं भी शामिल था,पर शायद इसमें मेरी कोई रज़ा तो न थी!!
ये सच है कि मुझसा तेरे लीये कोई दूसरा है ही नही, पर शायद इसमें मेरी कोई चाहत तो न थी!!
तेरी खुशी तेरी चाहत का सब ख्याल मैं रखता था, पर शायद इसमें मेरी खुशी शामिल तो न थी!!
तू मुकम्मल महसूस करता था मेरे होने पे, पर उस महफ़िल में मैं भी गुनगुनाऊँ ये शर्त तो न थी!!
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शिकायत

सुन एक बात आज बयाँ कर ही देता हूँ!!
मुझे तुझसे नही खुद से शिकायत है..आज तेरे बदले हुए लहजे ने मेरे एहसास बदल ही दिए!!
मुझे मोह्बत न सही फिर भी तेरी फ़िकर तो रहती थी…आज तेरे लफ़्ज़ों ने मेरे जज़्बात बदल ही दिए!!
मैं जैसा भी था फिर भी तेरे हिस्से में मैं यक़ीनपरस्त तो था..आज तेरे रवैये ने मेर दिल के पैरहम बदल ही दिए!!
तुम पर मैं फिदा न था फिर भी तेरे जज़्बात की क़दर थी..आज तेरे जवाब ने मेरे सारे सवाल बदल ही दिए!!
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Regards
Syed Mehdi
insta id : inkmyawaz
सैनिक और किसान
दीवाली आई संग यादें लाई

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